ध्वनि प्रदूषण: सामाजिक जिम्मेदारियों के लिए न्यायालय-प्रशासन के भरोसे क्यों?

उत्सव मनाना हमारा अधिकार है, लेकिन किसी की नींद, स्वास्थ्य और शांति छीनना नहीं। डीजे के शोर और ध्वनि प्रदूषण पर रोक के लिए भी यदि न्यायालय या प्रशासन का हस्तक्षेप जरूरी हो जाए, तो सवाल केवल कानून के उल्लंघन का नहीं, हमारे सामाजिक विवेक के पतन का है। क्या हम इतने लापरवाह समाज में बदलते जा रहे हैं कि दूसरे के अधिकार का सम्मान कराने के लिए भी अदालत और प्रशासन का सहारा लेना पड़े?
Editorial Analysis
Published: October 05, 2026 | Editor in Chief
Noise Pollution: Do We Need Courts for Every Social Responsibility?

Abstract: Rising noise during festivals raises a deeper question: have we become so socially irresponsible that courts and authorities must intervene to protect public health, peace and civic rights? The growing use of high-volume DJs, loudspeakers and sound systems has increasingly blurred the distinction between celebration and noise. Festivals have always been an important part of Indian social and cultural life, long before powerful sound-amplifying technologies became common. Yet today, excessive noise is often treated as a symbol of celebration, devotion and public participation.
This editorial argues that the real problem is not celebration or technology, but the growing disregard for the rights and well-being of others. Noise pollution can disrupt sleep, concentration and mental well-being and may affect cardiovascular health, particularly among children, elderly people, patients and other vulnerable groups.
India already has legal provisions regulating noise levels and protecting quiet and sensitive areas. The deeper failure, therefore, is not the absence of laws but their weak enforcement and declining civic responsibility. Permission to use a loudspeaker cannot mean permission to ignore legal limits.
The Balrampur tragedy and subsequent judicial intervention raise an uncomfortable question: should every basic social responsibility require a court order or administrative action? Courts can interpret rights, administrations can enforce rules and police can stop violations, but none can replace basic civic sensitivity.
Festivals should express joy, faith and community spirit, not impose noise on people who are not participating. The right to celebrate must be balanced with the right of others to sleep, study, recover and live peacefully.
A mature society does not ask how loudly it can celebrate; it asks how responsibly it can celebrate. If we need a court order to understand that another person's peace matters, then the problem is no longer merely noise pollution—it is a crisis of civic conscience.

Keywords: Noise Pollution, Festival Noise, DJ Noise, Social Responsibility, Civic Discipline, Public Health, Sound Pollution India, Loudspeaker Rules, Noise Pollution Rules 2000, Religious Festivals, Public Health and Noise, Environmental Pollution, Civic Rights, Eastern Scientist

बलरामपुर में सात वर्षीय स्कूली छात्रा वैष्णवी तिवारी की दुखद मृत्यु ने ध्वनि प्रदूषण के उस प्रश्न को फिर हमारे सामने ला खड़ा किया है, जिसे समाज लंबे समय से सुनते हुए भी अनसुना करता आया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा इस घटना का स्वतः संज्ञान लेकर इसे जनहित के प्रश्न के रूप में देखना न्यायिक व्यवस्था की सक्रियता का उदाहरण है, लेकिन इस घटना का सबसे असहज प्रश्न न्यायालय से नहीं, हमसे है—क्या हमारा समाज इतना लापरवाह होता जा रहा है कि अपनी सामान्य सामाजिक जिम्मेदारियों के लिए भी उसे न्यायालय या प्रशासन के हस्तक्षेप की प्रतीक्षा करनी पड़ती है?

यदि किसी बच्चे की जान जाने के बाद अदालत को यह पूछना पड़े कि सार्वजनिक आयोजनों में ध्वनि की सीमा का पालन क्यों नहीं हुआ, यदि किसी मरीज की नींद बचाने के लिए पुलिस को बुलाना पड़े, यदि किसी विद्यार्थी को पढ़ने के लिए प्रशासन से शांत वातावरण की मांग करनी पड़े, तो समस्या केवल कानून के उल्लंघन की नहीं है। यह हमारे सामाजिक विवेक पर भी गंभीर सवाल है।

ध्वनि प्रदूषण को हम अक्सर केवल कानों को परेशान करने वाली असुविधा समझकर टाल देते हैं। लेकिन लगातार या अत्यधिक शोर नींद, तनाव, एकाग्रता और हृदय-स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव से जुड़ा है। बच्चों, बुजुर्गों, बीमार लोगों और अन्य संवेदनशील व्यक्तियों के लिए इसका असर और गंभीर हो सकता है। इसलिए ध्वनि प्रदूषण केवल शोर का सवाल नहीं, स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता का प्रश्न है।

लेकिन इस समस्या का एक और पक्ष है, जिस पर बात करना जरूरी है—हमने आखिर शोर को उत्सव का पर्याय कब बना दिया?

उत्सव हम तब भी मनाते थे, जब डीजे जैसे कर्कश और अत्यधिक शक्तिशाली ध्वनि-विस्तारक हमारे सामाजिक जीवन का हिस्सा नहीं थे। गणेश उत्सव होते थे, दुर्गापूजा होती थी, रामलीला होती थी, बारातें निकलती थीं, धार्मिक जुलूस होते थे और सामुदायिक आयोजन होते थे। लोग गाते थे, नाचते थे, पूजा करते थे, मिलते थे और खुशियां बांटते थे। फिर भी किसी पूरे मोहल्ले को शोर में डुबो देना उत्सव की अनिवार्य शर्त नहीं था।

आज प्रश्न उठना चाहिए—क्या उत्सव की भव्यता उसकी आवाज की तीव्रता से तय होगी?

किसने यह तय किया कि डीजे जितना तेज होगा, उत्सव उतना बड़ा होगा? किसने मान लिया कि धार्मिक उत्साह की अभिव्यक्ति स्पीकर की क्षमता से और सामुदायिक खुशी की ऊंचाई डेसीबल से मापी जाएगी?

डीजे और आधुनिक ध्वनि-विस्तारक तकनीक अपने आप में समस्या नहीं हैं। समस्या तब पैदा होती है जब तकनीक सुविधा से आगे बढ़कर प्रदर्शन और प्रतिस्पर्धा का माध्यम बन जाती है—किसकी आवाज अधिक तेज है, किसका डीजे अधिक दूर तक सुनाई दे रहा है, किसका जुलूस अधिक शोर कर रहा है। धीरे-धीरे संगीत पीछे चला जाता है और ध्वनि की तीव्रता ही आयोजन की पहचान बनने लगती है।

उत्सव और शोर एक नहीं हैं।

उत्सव आनंद की अभिव्यक्ति है; शोर दूसरे की शांति पर अतिक्रमण। उत्सव में आप शामिल होते हैं; शोर में आपको शामिल कर दिया जाता है। उत्सव लोगों को जोड़ता है; शोर उन लोगों को भी अपनी मौजूदगी स्वीकार करने के लिए मजबूर करता है जो उस आयोजन का हिस्सा नहीं हैं।

जिस बच्चे की पढ़ाई बाधित हो रही है, जिस मरीज को आराम नहीं मिल रहा, जिस बुजुर्ग की नींद टूट रही है या जिस परिवार को अपने घर में सामान्य बातचीत के लिए खिड़कियां बंद करनी पड़ रही हैं, उसके लिए यह उत्सव नहीं, थोपा गया शोर है।

इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि “हम उत्सव क्यों मना रहे हैं?” सवाल यह होना चाहिए कि हमारा उत्सव किसकी कीमत पर मनाया जा रहा है?

हमारे पास उत्सव मनाने की लंबी परंपरा है, लेकिन शोर को उत्सव की अनिवार्यता मानने की कोई सांस्कृतिक मजबूरी नहीं है। हमने बिना डीजे के उत्सव मनाए हैं और वे उत्सव कम आनंदपूर्ण नहीं थे। इसका अर्थ यह है कि आधुनिक ध्वनि-विस्तारक केवल साधन हैं, उत्सव की आत्मा नहीं।

भारत में ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए कानूनी व्यवस्था भी पहले से मौजूद है। ध्वनि प्रदूषण (विनियमन एवं नियंत्रण) नियम, 2000 विभिन्न क्षेत्रों के लिए ध्वनि की सीमाएं निर्धारित करते हैं। औद्योगिक, वाणिज्यिक, आवासीय और शांत क्षेत्रों के लिए अलग-अलग मानक हैं। विद्यालय, अस्पताल और न्यायालय जैसे संवेदनशील स्थानों के आसपास शांत क्षेत्र की अवधारणा भी इसी उद्देश्य से है।

फिर समस्या कहां है?

बड़ी समस्या कानून की अनुपस्थिति से अधिक कानून के पालन और सामाजिक अनुशासन की कमी है।

लाउडस्पीकर या डीजे की अनुमति को कई बार यह मान लिया जाता है कि अब आवाज की सीमा भी आयोजक की इच्छा पर निर्भर है। जबकि अनुमति किसी आयोजन को नियमों से ऊपर नहीं रखती। ध्वनि-सीमा, समय-सीमा और संवेदनशील क्षेत्रों से जुड़े नियमों का पालन करना अनिवार्य है।

प्रशासन की जिम्मेदारी केवल अनुमति जारी करने तक समाप्त नहीं हो सकती। उसे यह भी देखना होगा कि अनुमति की शर्तें वास्तव में लागू हो रही हैं। बड़े आयोजनों और प्रमुख त्योहारों के दौरान सक्रिय निगरानी, ध्वनि-स्तर की माप और उल्लंघन पर तत्काल कार्रवाई आवश्यक है। केवल शिकायत मिलने के बाद कार्रवाई करने वाली व्यवस्था पर्याप्त नहीं हो सकती।

तकनीक इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। बड़े आयोजनों में डिजिटल साउंड-लेवल मीटर और ध्वनि-प्रणालियों में प्रमाणित साउंड लिमिटर के इस्तेमाल से नियमों का पालन अधिक प्रभावी ढंग से कराया जा सकता है। इससे यह विवाद भी कम होगा कि आवाज कितनी थी—क्योंकि निर्णय अनुमान के बजाय मापे गए ध्वनि-स्तर पर आधारित हो सकता है।

लेकिन यहां फिर वही मूल प्रश्न लौटता है—क्या हर जिम्मेदारी प्रशासन की है?

यदि अस्पताल के सामने जुलूस निकल रहा है, तो क्या हमें पुलिस के आने की प्रतीक्षा करनी चाहिए? यदि किसी घर में परीक्षा की तैयारी कर रहा बच्चा है, तो क्या पड़ोसी को तब तक अपनी आवाज कम नहीं करनी चाहिए जब तक कोई अधिकारी उसे ऐसा करने का आदेश न दे? यदि आसपास कोई बीमार या वृद्ध व्यक्ति है, तो क्या उसकी परेशानी हमें तब तक दिखाई नहीं देगी जब तक वह लिखित शिकायत न करे?

एक सभ्य समाज केवल कानून से नहीं चलता। वह स्वैच्छिक अनुशासन, संवेदना और दूसरे के अधिकारों के सम्मान से चलता है।

कानून इसलिए जरूरी है क्योंकि हर व्यक्ति स्वयं अपनी सीमा नहीं समझता। लेकिन यदि समाज की हर छोटी-बड़ी मर्यादा पुलिस के डंडे और न्यायालय के आदेश से तय करनी पड़े, तो हमें अपने सामाजिक विवेक की स्थिति पर भी विचार करना होगा।

यही कारण है कि बलरामपुर की घटना को केवल एक दुर्घटना मानकर आगे बढ़ जाना पर्याप्त नहीं होगा। यह घटना प्रशासन से भी सवाल करती है और समाज से भी।

प्रशासन से सवाल है कि नियम होते हुए उनका प्रभावी पालन क्यों नहीं हो पाया? आयोजकों से सवाल है कि क्या उत्सव की तैयारी में आसपास रहने वाले लोगों के अधिकारों का भी ध्यान रखा गया? और समाज से सवाल है कि क्या हमने यह मान लिया है कि जब तक कोई कानून हमें रोक नहीं रहा, तब तक हम जो चाहें कर सकते हैं?

यदि ऐसा है तो यह लोकतांत्रिक नागरिकता की गंभीर भूल है। अधिकार और जिम्मेदारी एक-दूसरे से अलग नहीं हो सकते। हमें धार्मिक स्वतंत्रता चाहिए, लेकिन सार्वजनिक स्वास्थ्य की कीमत पर नहीं। हमें उत्सव की स्वतंत्रता चाहिए, लेकिन दूसरे की नींद और शांति छीनकर नहीं। हमें अपनी खुशी मनाने का अधिकार चाहिए, लेकिन दूसरे व्यक्ति को अपनी खुशी सहने के लिए मजबूर करने का अधिकार नहीं।

आपकी खुशी का अधिकार वहीं तक है, जहां से दूसरे की शांति का अधिकार शुरू होता है।

यही एक सभ्य समाज की बुनियादी समझ होनी चाहिए। इसलिए ध्वनि नियंत्रण को किसी धर्म या समुदाय के विरुद्ध कार्रवाई के रूप में देखने की जरूरत नहीं है। यह किसी आस्था को रोकने का प्रश्न नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन में पारस्परिक सम्मान स्थापित करने का प्रश्न है। संगीत रहे, उत्सव रहे, धार्मिक आयोजन हों, जुलूस हों—लेकिन उनकी सीमा वहां तय होनी चाहिए जहां से दूसरे व्यक्ति के स्वास्थ्य, नींद और सामान्य जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव शुरू होता है।

हमें उत्सव की परिभाषा भी बदलनी होगी। किसी जुलूस की सफलता इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि उसका डीजे कितनी दूर तक सुनाई दिया। किसी धार्मिक आयोजन की शक्ति उसके शोर में नहीं, उसकी संवेदना में दिखाई देनी चाहिए। किसी समारोह की भव्यता इस बात से नहीं तय होनी चाहिए कि कितने लोगों की नींद टूट गई।

उत्सव की पहचान उसकी ऊंची आवाज नहीं, उसकी ऊंची संवेदना होनी चाहिए।

और यही वह जगह है जहां न्यायालय से पहले समाज को स्वयं अपने भीतर झांकना होगा।

न्यायालय कानून की व्याख्या कर सकता है। प्रशासन नियम लागू कर सकता है। पुलिस उल्लंघन रोक सकती है। लेकिन किसी दूसरे मनुष्य की परेशानी को महसूस करना और उसके अधिकार का सम्मान करना—यह काम अंततः समाज को स्वयं करना होगा।

यदि हर बार किसी बच्चे की सुरक्षा के लिए अदालत को हस्तक्षेप करना पड़े, हर बार किसी मरीज की शांति के लिए पुलिस बुलानी पड़े और हर बार नागरिकों को अपने सामान्य जीवन के अधिकार के लिए प्रशासन का दरवाजा खटखटाना पड़े, तो प्रश्न केवल व्यवस्था की विफलता का नहीं रहेगा।

प्रश्न यह भी होगा कि हमारा सामाजिक विवेक कहां चला गया?

बलरामपुर की घटना हमें यही चेतावनी देती है कि हमें ऐसा समाज नहीं बनना चाहिए जहां कानून केवल इसलिए जरूरी हो कि नागरिक स्वेच्छा से मर्यादा स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। उत्सव मनाइए। संगीत बजाइए। आस्था व्यक्त कीजिए। खुशियां बांटिए। लेकिन यह भी याद रखिए कि सार्वजनिक जीवन केवल आपका नहीं है।

उत्सव आपका अधिकार है, लेकिन दूसरे की शांति भी उसका अधिकार है. और यदि इन दोनों के बीच संतुलन बनाने के लिए हर बार न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़े, तो कानून से पहले हमें अपने भीतर के नागरिक को जगाने की जरूरत है।

क्योंकि एक सभ्य समाज की असली पहचान यह नहीं कि उसके पास कितने कानून हैं, बल्कि यह है कि कानून लागू कराने के लिए उसे कितनी बार न्यायालय और प्रशासन की जरूरत पड़ती है।

Dr. R. Achal Pulastey

Dr. R. Achal Pulastey

Editor-in-Chief, Eastern Scientist

A multifaceted scholar with a keen insight into—and a research focus on—socio-cultural, folkloric-literary, economic, geopolitical dynamics, and Ayurveda.

ORCID iD ORCID: 0009-0002-8240-2689

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